Skip to main content

राजस्थान की प्रमुख प्रागैतिहासिक सभ्यतायें

राजस्थान के प्रमुख पुरातात्विक स्थल

  • पाषाणकालीन सभ्यता – दर (भरतपुर), बागोर (भीलवाड़ा), तिलवाड़ा (बाड़मेर)।
  • हड़प्पा सभ्यता – कालीबंगा (हनुमानगढ़), आहड़ (उदयपुर), गिलुण्ड (राजसमंद) में।
  • ताम्रयुगीन सभ्यता – गणेश्वर (सीकर), बालाथल (उदयपुर), नोह (भरतपुर) आदि स्थलों पर।


  1. कालीबंगा (हनुमानगढ़) –सरस्वती (दृषद्वती) नदी के तट पर (वर्तमान घग्घर नदी) विकसित।
  • कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ- काली चूड़ियाँ।
  • कालीबंगा सैन्धव सभ्यता का पाँचवा महत्वपूर्ण नगर था।
  • सर्वप्रथम खोज – 1951 ई. – अमलानन्द घोष द्वारा। 1961-69 ई. में – ब्रजवासी लाल व बालकृष्ण थापर द्वारा खुदाई।
  • सैन्धव सभ्यता से भी प्राचीन।
  • विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं के समकक्ष।
  • सैन्धव सभ्यता की तीसरी राजधानी कालीबंगा थी। (पहली-हड़प्पा, दूसरी-मोहनजोदड़ो)
  • यहाँ मकानों में साधारण चुल्हे के अलावा तन्दुरी चुल्हे के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ से प्राप्त एक मुहर पर व्याघ्र का अंकन है जबकि सिन्धु क्षेत्र में व्याघ्र नहीं मिलता है।
  • राजस्थान सरकार द्वारा यहाँ से प्राप्त पुरावशेषों के संरक्षण हेतु एक संग्रहालय की स्थापना की गयी।
  • यहाँ परकोटे के बाहर एक जुते हुए खेत के अवशेष मिले हैं, जो विश्व में जुते हुए खेत का पहला प्रमाण है।


  • यहाँ से प्राप्त जुते हुए खेत में चना व सरसों बोया जाता था।
  • कालीबंगा सैन्धव सभ्यता का एकमात्र ऐसा स्थल है, जहाँ से मातृ देवी की मूर्तियाँ प्राप्त नहीं हुई है।
  • यहाँ से ताँबे के बैल की आकृति, भूकम्प के प्रमाण तथा ईंटों के मकान के प्रमाण मिले हैं।
  • कालीबंगा में समकोण दिशा में जूते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
  • इसमें गेहूँ, जौ एक साथ बोई जाती थी।
  • कपास की खेती के साक्ष्य सर्वप्रथम कालीबंगा में मिले हैं।
  • कालीबंगा में खेत के दो पाडे थे क+
  • मदुरी – चना, गेहूँ अधिक दूरी सरसों व कपास
  • कालीबंगा की लिपि दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी जो अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
  • कालीबंगा में कच्र्ची ईंटों का प्रयोग होता था।
  • कालीबंगा में पूर्व-पश्चिम व उत्तर-दक्षिण की सड़कें एक-दूसरे को समकोण दिशा में काटती है।


  • कालीबंगा में सड़कों की चैड़ाई 2 मीटर तथा गलियों की चैड़ाई 1.8 मीटर थी।
  • कालीबंगा में भवनों के द्वार सड़कों पर न खुलकर गलियों में खुलते थे।
  • कालीबंगा के लोग मुख्यतः शव को दफनाते थे।
  • कालीबंगा के प्रमुख पशु- गाय, बैल, भैंस, बकरी, कुत्ता, ऊँट सुअर।
  • कुत्ता कालीबंगा सभ्यता का प्रमुख पालतु जानवर था।
  • कालीबंगा में रेत के दो टीले मिले हैं- पश्चिम में छोटा टीला मिला है। जिसे गढ़ी क्षेत्र तथा पूर्व में बड़ा टीला मिला है। जिसे नगर क्षेत्र कहते हैं।
  • कालीबंगा में मिली प्रमुख सामग्री- मैसोपोटामिया की मोहर मिट्टी से निर्मित।
  • एक कुएँ के समीप 7 आयताकार यज्ञ वेदियाँ प्राप्त हुई है।
  • यहाँ पर भूकम्प के साक्ष्य मिले हैं।
  • शिशु की खोपड़ी भी प्राप्त हुई जिसमें गोल छिद्र। इससे कपाल दोहन क्रिया का पता चलता है।
  • कालीबंगा में दो टीलों पर उत्खनन कार्य किया गया। छोटे टीले के उत्खनन में निचले स्तरों से प्राप्त सामग्री से यहाँ पूर्व हड़प्पा कालीन सभ्यता (2400 ई. पूर्व) के अवशेष प्राप्त हुए हैं तथा दूसरे टीले से हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं जो लगभग 2300 वर्ष ई. पूर्व विकसित हुई थी।


  1. आहड़ (उदयपुर शहर के पास) –आहड़नदी के तट पर (जो बनास की सहायक नदी है।)
  • प्राचीन नाम – ताम्रवती नगरी/तांबावली।
  • 10-11वीं सदी में नाम – आघाटपुर या आघाट दुर्ग।
  • स्थानीय नाम – धूलकोट।
  • लगभग 2000 ई. पू. से 1200 ई.पू. की ताम्रयुगीन सभ्यता।
  • उत्खनन – सर्वप्रथम 1953 ई. – अक्षय कीर्ति व्यास।
  • 1956 ई.-रतनचन्द्र अग्रवाल, 1961 ई.- एच.डी. सांकलिया द्वारा।
  • यहाँ का प्रमुख उद्योग ताँबा गलाना एवं उसके उपकरण बनाना था, जिसका प्रमाण यहाँ प्राप्त हुए ताम्र कुल्हाड़े व अस्त्र तथा एक घर में तांबा गलाने की भट्टी है। यहाँ पास में ही ताँबे की खदानें थी।


  • आहड़ की खुदाई में 6 तांबे की मुद्राएं और 3 मुहरें मिली हैं।
  • मुद्रा पर एक ओर त्रिशुल तथा दूसरी ओर अपोलो है।
  • यहाँ पर ताम्बे के बर्तन, कुल्हाड़ी तथा उपकरण भी मिले हैं।
  • आहड़ में माप-तौल के बाट मिले हैं जिससे इनके व्यापार वाणिज्य के बारे में पता चलता है।
  • आहड़ में मकान पक्की ईंटों के मिले हैं।
  • आहड़ सभ्यता के लोग मृतकों के साथ आभुषण भी दफनाते थे।
  • यह लाल व काले मृद्भाण्ड वाली संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था। ये मृद्भाण्ड उल्टी तिपाई विधि से पकाए जाते थे।
  • अनाज रखने के बड़े मृद्भाण्ड मिले हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में गोरे व कोट कहा जाता था।
  • यहाँ से प्राप्त एक मुद्रा पर अपोलो खड़ा दिखाया गया है व इस पर यूनानी भाषा में लेख भी है।
  • शरीर से मेल छुड़ाने का झावा भी मिला है।


  1. गिलुण्ड (राजसमंद) –आहड़ नदी के तट पर ताम्रयुगीन एवं बाद की सभ्यता के अवशेष मिले।
  2. बागोर (भीलवाड़ा) –कोठारी नदी के तट पर, उत्तर पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष, 3000 ई.पू. तक।
  • उत्खनन – 1967-69 ई. – वी.एन.मिश्रा व डा.एल.एस. लैशनि द्वारा।
  • यहाँ पर सभ्यता के तीन स्तरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।


  1. बालाथल (वल्लभनगर, उदयपुर) –
  • ताम्र-पाषाणयुगीन सभ्यता, (3000 ई.पू..2500 ई.पू.)
  • उत्खनन- 1993 ई.- वी.एस.शिंदे, वी.एन.मिश्रा, आर के मोहन्ते।
  • हड़प्पा की तरह के मृदभाण्ड प्राप्त ।
  • कपड़े के अवशेष मिले।
  • यहाँ खुदाई में 11 कमरों के बड़े भवन की रचना प्राप्त हुई।
  • बैल व कुत्ते की मृणमूर्तियाँ भी प्राप्त हुई।


  1. गणेश्वर (नीम का थाना, सीकर) –कांतली नदी का टीला।
  • भारत की ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी।
  • 99% उपकरण व औजार ताम्र निर्मित मिले।
  • पूर्व हड़प्पा कालीन ताम्रयुगीन सभ्यता – 2800 ई.पू.
  • यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे, केशपीन व अंजन स्लाकाएँ प्राप्त हुई है।
  • मकान पत्थर के बनाए जो थे।
  1. रंगमहल (हनुमानगढ़) –सरस्वती (घग्घर) नदी के पास।
  • उत्खनन-1952-54 ई. में डाॅ. हन्नारिड के निर्देशन मे एक स्वीडिश दल द्वारा।
  • यहाँ पर कुषाण शासकों के सिक्के व मिट्टी की मुहरें भी मिली। अतः इसे कुषाणकालीन सभ्यता के समान माना जाता है।
  • यहाँ पर लाल रंग के पात्रों पर काले रंग के डिजाइन प्राप्त हुए हैं।


  1. बैराठ (जयपुर) –प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी।
  • आधुनिक नाम बैराठ, जो पहले विराटनगर कहलाता था।
  • यहाँ खुदाई का कार्य सर्वप्रथम दयाराम साहनी ने किया।
  • यहाँ मौर्यकालीन एवं पूर्व की सभ्यताओं के अवशेष, मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेख (भाब्रु शिलालेख) यहीं से प्राप्त, एक गोल बौद्ध मंदिर के अवशेष।
  • भाब्रु शिलालेख में अशोक का धर्म अंकित है।
  • भाब्रु शिलालेख एक मात्र लेख है, जो अशोक को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताता है।
  • कपड़े के अवशेष मिले।
  • प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर (वर्तमान बैराठ) में बीजक की पहाड़ी भीमजी को डूंगरी तथा महादेवजी की डूंगरी आदि स्थानों पर उत्खनन कार्य प्रथम बार दयाराम साहनी द्वारा 1936-37 में तथा पुनः 1962-63 में नीलरत्न बनर्जी तथा कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा किया गया।


  • 1837 में आबु पहाड़ी से सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण दो प्रस्तर लेख भी प्राप्त हुए हैं।
  • जिनसे अशोक की बुद्ध थम्म और संघ में अगाध निष्ठा लक्षित होती है।
  • विराट नगर के मध्य में अकबर ने एक टकसाल खोली थी। इस टकसाल में अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में ताँबे के सिक्के ढाले जाते थे।
  1. ओझियाना (भीलवाड़ा) –यहाँ उत्खनन कार्य 1993 में प्रारम्भ हुआ।
  • ताम्र पाषाणयुगीन संस्कृति के अवशेष मिले।
  1. नगरी (चित्तौड़गढ़) –प्राचीन मध्यमिका (शिवि की राजधानी), चित्तौड़ के पास, 1904 ई. में भण्डारकर द्वारा सर्वप्रथम खुदाई।
  • यहाँ 1962 में केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के के.बी. सौन्दरराजन द्वारा कराई गई खुदाई में शिवि जनपद के सिक्के, गुप्तकालीन कला के अवशेष मिले।


  1. जोधपुरा (जयपुर) –शुंग व कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष। लगभग 2500 ई.पू. से 200 ई. तक।
  • यहाँ पर अयस्क से लोहा प्राप्त करने की प्राचीनतम भट्टी मिली है।
  1. सुनारी (खेतड़ी, झुन्झुनुँ) –लोहा बनाने की प्राचीनतम भट्टियाँ प्राप्त हुई।
  2. तिलवाड़ा (बाड़मेर) –लूनी नदी के तट पर 500 ई.पू. से 200 ई. तक के अवशेष
  3. रेड/रेढ़ (टोंक) –निवाई तहसील स्थित रेड में पूर्व गुप्तकालीन सभ्यता के अवशेष, लोह सामग्री के विशाल भण्डार। इसे ‘प्राचीन भारत का टाटानगर’कहते हैं।


  • यहाँ से एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार मिला है।
  1. नगर (टोंक) –उणियारा कस्बे में स्थित, प्राचीन नाम ‘मालव नगर’था। गुप्तकालीन अवशेष मिले।
  • यहाँ छः हजार मालव सिक्के भी मिले हैं।
  1. भीनमाल (जालौर) –गुप्तकालीन अवशेष, चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा इस नगर की यात्रा। विद्वान ब्रह्मगुप्त, मण्डन, माघ, माहुक, धाइल्ल इसी नगर से सम्बन्धित।
  2. दर (भरतपुर) –इस स्थान पर पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष मिले है।


  3. सोंथी (बीकानेर) –कालीबंगा प्रथम के नाम से विख्यात, अमलानंद घोष के नेतृत्व में 1953 में इस सभ्यता की खुदाई की गई।
  4. ईसवाल (उदयपुर) –इस स्थान पर खुदाई के दौरान लौहकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं (वर्ष 2003)।
  5. डडीकर (अलवर) –पाँच से सात हजार वर्ष पुराने शैल चित्र मिले हैं (वर्ष 2003)।
  6. गरड़दा (बूँदी) –छाजा नदी के किनारे स्थित इस स्थान पर पहली बर्ड राइडर राॅक पेन्टिंग (शैल चित्र) मिली है।
  • यह देश में प्रथम पुरातत्व महत्त्व की पेन्टिंग है (वर्ष 2003)।
  1. कोटड़ा (झालावाड़) –इस स्थान पर स्थित दीपक शोध संस्थान द्वारा सातवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य के पुरा अवशेषों की खोज की गयी है (वर्ष 2003)।


  2. नलियासर (सांभर, जयपुर) –सांभर झील के निकट इस स्थान पर खुदाई से चैहान युग से पूर्व की सभ्यता का ज्ञान प्राप्त हुआ है।
  3. तिपटिया (कोटा) –यह स्थल दर्रा वन्य जीव अभ्यारण्य में स्थित है। जहाँ से प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्र मिले हैं।
  4. डाडाथोरा (बीकानेर) –शिव बाड़ी के निकट स्थित इस गाँव से पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  5. कुण्डा व ओला (जैसलमेर) –जैसलमेर के इन गांवों में पुरानी सभ्यता व मध्यपाषाण युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  6. मल्लाह (भरतपुर) –यह स्थल भरतपुर जिले के ‘घना पक्षी अभ्यारण्य‘ क्षेत्र के मध्य स्थित है। यहां से अत्यधिक मात्रा में ‘ताम्र हारपून‘ तथा ‘तलवारें‘ प्राप्त हुई हैं। यह ताम्रयुगीन सभ्यता स्थल है।
  7. नैंनवा (बूँदी) –बूँदी जिले के इस नगर में श्री कृष्ण देव ने खुदाई करायी। यहाँ से लगभग 2000 वर्ष प्राचीन महिषासुर-मर्दिनी की मृण मूर्ति प्राप्त हुई है।
  8. कणसव (कोटा) –यहाँ से मौर्य शासक धवल का 738 ई. से सम्बन्धित लेख मिला है।


राजस्थान के विभिन्न जनपद

  1. आबु (सिरोही) – अर्बुद
  2. महावीर जी (करौली) – चान्दन
  3. रामदेवरा – रुणेचा
  4. करौली – गोपालपाल, कल्याणपुरी
  5. धौलपुर – कोठी
  6. झालरापाटन – बृजनगर
  7. अलवर – आलौर, साल्वपुर
  8. भीनमाल (जालौर) – श्रीमाल
  9. बयाना (भरतपुर) – श्रीपंथ
  10. सांचोर (जालौर) – सत्यपुर
  11. जालौर – जबालिपुर (अलाउद्दीन खिलजी ने जलालाबाद रखा)
  12. नागौर – नागदुर्ग, अहिच्छत्रपुर (अक्षत्रियपुर)
  13. सांभर – शाकम्भरी, सपादलक्ष
  14. जयसमंद – ढेबर
  15. चित्तौड़गढ़ – चित्रकूट (अलाउद्दीन खिलजी ने खिज्राबाद रखा)
  16. अजमेर – अजयमेरू
  17. हनुमानगढ़ – भटनेर
  18. नाथद्वारा (राजसमंद) – सिंघाड़
  19. विजयनगर (भीलवाड़ा)- बिजोलिया
  20. बैराठ – विराटनगर, विराटपुर
  21. मंडोर – माण्डव्यपुर
  22. तारागढ़ (अजमेर) – गढ़ बीठली
  23. बूँदी – वृन्दावती
  24. ऋषभदेव (उदयपुर) – धूलैव
  25. आमेर – अम्बावती
  26. मेवाड़ – मेदपाट, प्राग्वाट
  27. नगरी (चित्तौड़गढ़) – माध्यमिका


28.जैसलमेर -मांड, वल्लदेश

  1. मारवाड़ – मरूवार, मरू
  2. नाडोल (पाली) – नाडुल्य
  3. अरावली – आडावल
  4. उदयपुर – शिवि
  5. हनुमानगढ़ और गंगानगर के पास का क्षेत्र – यौद्वेय
  6. उदयपुर नगर के पास का क्षेत्र – गिरवा
  7. अजमेर व राजसमंद जिले का दिवेर क्षेत्र – मेरवाड़ा
  8. प्रतापगढ़, झालावाड़ – मालव देश
  9. अलवर का उत्तरी भाग – कुरू देश
  10. बीकानेर व चुरु का अधिकांश भाग एवं दक्षिणी गंगानगर की मरुभूमि – थली (उत्तरी मरुभूमि)
  11. कोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़ – हाड़ौती
  12. भरतपुर, करौली, धौलपुर – शूरसेन
  13. उदयपुर जिले की गोगुन्दा, राजसमंद की कुंभलगढ़ तहसील – भोराठ का पठारी क्षेत्र
  14. भीलवाड़ा जिले की जहाजपुर तहसील व अधिकांश टोंक जिला – खेराड़ एवं मालखेराड़
  15. डूँगरपुर, बाँसवाड़ा के मध्य का भाग – मेवल
  16. डूँगरपुर, पूर्वी सिरोही व उदयपुर जिले का अरावली पर्वतीय आदिवासी प्रदेश – भोमट क्षेत्र
  17. प्रतापगढ़ – कांठल, छप्पन का मैदान
  18. जयपुर व आस-पास का क्षेत्र – ढूंढाड़
  19. अरावली पर्वतीय प्रदेश – मेरू
  20. जोधपुर व आस-पास का क्षेत्र – मारवाड़
  21. जालोर व पाली का कुछ भाग – गोंडवाड़ा

ऐतिहासिक स्रोत तथा भारतीय सभ्यता के विकास में राजस्थान का योगदान - कालीबंगा व आहड़ का सांस्कृतिक राजस्थान का योगदान - कालीबंगा वा आहड़ का सांस्कृतिक महत्व)

मानव सभ्यता का इतिहास वस्तुत: मानव के विकास का इतिहास है। इस दिशा में जो महत्वपूर्ण खोज हुई हैं, उनके अनुसार ऐसा अनुमान किया जाता है कि लगभग अस्सी करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर जीवन के चिह्म प्रकट होने लगे थे। मनुष्य अपने प्रारम्भिक जीवन में पशुवत् था। इस पशुवत् जीवन से ऊपर उठने के लिए उसने हजारों वर्ष लिए। मनुष्य के हजारों वर्ष के इस विकास का लिपिबद्ध और क्रमागत प्रमाणिक इतिहास प्राप्त नहीं हैं। इसलिए इस युग के इतिहासकारों ने प्रागैतिहासिक युग की संज्ञा दी है।

प्रागैतिहासिक युग के मानव ने अपने जीवन-यापन व जीवन रक्षा हेतु जिन पदार्थों से बने हथियार व औज़ारों व अन्य उपरकरणों का प्रयोग किया था और विश्व व भारत के विभिन्न भागों में अवशेष के रुप में अथवा उत्खन्न के फलस्वरुप उपलब्ध हुए हैं। उनके आधार पर प्रागैतिहासिक काल को चार क्रमिक सोपानों में विभक्त किया जाता है :

(क) आदिम पाषाणकाल;

(ख) पूर्व पाषाणकाल;

(ग) उत्तर पाषाणकाल;

(घ) धातुकाल; धातुकाल पुन: तीन भागों में बाटें गये है :

(घ.१) ताम्र युग;

(घ.२) कांस्य युग;

(घ.३) लौह युग;

राजस्थान के प्रागैतिहासिक काल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं

प्रागैतिहासिक राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत एवं विशेषताएँ

राजस्थान में प्रस्तर युग के स्रोत एवं विशेषताएँ :

राजस्थान में प्रस्तर युगीन मानव के निवास का पता उन उपलब्ध प्रस्तर हथियारों व औज़ारों से लगता है जो वर्तमान में बांसवाड़ा, डूँगरपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, बूंदी, कोटा, झालावाड़, जयपुर आदि जिलों में 'बनाल' गम्भीरी, बेडच, बाधन तथा चम्बल नदियों की घाटियों व तटवर्ती स्थानों से उपलब्ध हुए हैं। ये हथियार व औज़ार जिनका प्रयोग प्रस्तर युगीन मानव करते थे वे कटुता या अत्यन्त भध्दे, भौण्डे व अनगढ़ थे। इस प्रकार के अवशेषों से प्राप्ति स्थलों में निम्नांकित उल्लेखनीय हैं -

(क) 
गम्भीरी नदी के तट पर चितौड़गढ़ जिले में नगरी, खीट, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अयनार, ऊणचा, देवजडी, हीसेजी सा खेड़ा, बूले खेड़ा आदि स्थान;

(ख)
चम्बल, और बामनीनदी के तट पर भैंसरड़िगड़ व नगधार स्थान;

(ग)
बनास नदी के तट पर भीलवड़ा जिलें में हमीरगढ़, स्वरुपगंज, मंडदिया, बीगोद, जहाजपुर, खुटियास। देवली, मंगरपि, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुगरिया, गिलूड आदि स्थान;

(घ)
लूणी नदी के तट पर जोधपुर में;

(च)
गुहिया और बाँडी नदी की घाटी में सिंगारी व पाली स्थान, मारवाड़ में पीचरु, भाँडेल, धनवासनी, सजिता, धनेरी, भेटान्दा, दुन्दास, गोलियो, पीपाड़, खीमसर, उम्मेद-नगर आदि स्थान;

(छ)
बनास नदी के तट पर तैंरु जिले में भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, लियालपुरा, पच्चर, तरावट, गोगासला, भरनी, आदि स्थान;

(ज)
गागारोन (जिला झालाबाड़), गोविन्दगढ़ (अजमेर ज़िले में सागरमती नदी तट पर), कोकानी (कोटा ज़िले में परवन नदी तट पर), आदि अन्य स्थान।

विशेषताएँ - भारतीय पुरातत्व का सर्वेक्षण (१९५८-६०) के आधार पर सत्यप्रकाश व दशरथ शर्मा ने उपर्युक्त स्रोतों के आधार पर राजस्थान में प्रस्तरयुगीन मानव की सभ्यता पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि "प्रस्तर युगीन मानव का राजस्थान में आहार शिकार किए हुए बनैले जानवरों का मांस आदि प्रकृति द्वारा उपजाए क़ंद, मूल, फल आदि थे। इस काल का मनुष्य अपने मृतकों को जानवरों पक्षियों और मछलियों के लिए मैदान या पानी में फेंक दिया करता था।"

राजस्थान

प्रागैतिहासिक राजस्थान की विशेषताएँ

राहुल तनेगारिया


राजस्थान के प्रागैतिहासिक काल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं

प्रागैतिहासिक राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत एवं विशेषताएँ

राजस्थान में प्रस्तर युग के स्रोत एवं विशेषताएँ

राजस्थान में प्रागैतिहासिक प्रस्तर-धातु युग

स्तोत्र

कालीबंगा का सांस्कृतिक महत्व व राजस्थान का मानव सभ्यता के विकास में योगदान

कालीबंगा से प्राप्त प्रागैतिहासिक हड़प्पा (सिंधु घाटी) सभ्यता के स्रोत के रुप में अवशेष

(क) ताँबे के औज़ार व मूर्तियाँ

(ख) अंकित मुहरें

(ग) ताँबे या मिट्टी की बनी मूर्तियाँ, पशु-पक्षी व मानव कृतियाँ

(घ) तोल के बाट

(च) बर्तन

(छ) आभूषण

(ज) नगर नियोजन

(झ) कृषि-कार्य संबंधी अवशेष

(ट) खिलौने

(ठ) धर्म संबंधी अवशेष

(ड) दुर्ग (किला)

आहड़ का सांस्कृतिक महत्व

आहड़कालीन संस्कृति की स्थिति

आहड़ सभ्यता के केन्द्र व काल

स्रोत-सामग्री अवशेषों के आधार पर आहड़-संस्कृति की विशेषताएँ

उत्खनन स्थल

बस्तियों के स्तर

विभिन्न बस्तियों के अवशेष

औज़ार वा आभूषण

मूर्तियाँ व पूजा-सामग्री

कृषि व बर्तन बनाने की कला



(ऐतिहासिक स्रोत तथा भारतीय सभ्यता के विकास में राजस्थान का योगदान - कालीबंगा व आहड़ का सांस्कृतिक राजस्थान का योगदान - कालीबंगा वा आहड़ का सांस्कृतिक महत्व)

मानव सभ्यता का इतिहास वस्तुत: मानव के विकास का इतिहास है। इस दिशा में जो महत्वपूर्ण खोज हुई हैं, उनके अनुसार ऐसा अनुमान किया जाता है कि लगभग अस्सी करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर जीवन के चिह्म प्रकट होने लगे थे। मनुष्य अपने प्रारम्भिक जीवन में पशुवत् था। इस पशुवत् जीवन से ऊपर उठने के लिए उसने हजारों वर्ष लिए। मनुष्य के हजारों वर्ष के इस विकास का लिपिबद्ध और क्रमागत प्रमाणिक इतिहास प्राप्त नहीं हैं। इसलिए इस युग के इतिहासकारों ने प्रागैतिहासिक युग की संज्ञा दी है।

प्रागैतिहासिक युग के मानव ने अपने जीवन-यापन व जीवन रक्षा हेतु जिन पदार्थों से बने हथियार व औज़ारों व अन्य उपरकरणों का प्रयोग किया था और विश्व व भारत के विभिन्न भागों में अवशेष के रुप में अथवा उत्खन्न के फलस्वरुप उपलब्ध हुए हैं। उनके आधार पर प्रागैतिहासिक काल को चार क्रमिक सोपानों में विभक्त किया जाता है :

(क) आदिम पाषाणकाल;

(ख) पूर्व पाषाणकाल;

(ग) उत्तर पाषाणकाल;

(घ) धातुकाल; धातुकाल पुन: तीन भागों में बाटें गये है :

(घ.१) ताम्र युग;

(घ.२) कांस्य युग;

(घ.३) लौह युग;

Top

 

राजस्थान के प्रागैतिहासिक काल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं

प्रागैतिहासिक राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत एवं विशेषताएँ

राजस्थान में प्रस्तर युग के स्रोत एवं विशेषताएँ :

राजस्थान में प्रस्तर युगीन मानव के निवास का पता उन उपलब्ध प्रस्तर हथियारों व औज़ारों से लगता है जो वर्तमान में बांसवाड़ा, डूँगरपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, बूंदी, कोटा, झालावाड़, जयपुर आदि जिलों में 'बनाल' गम्भीरी, बेडच, बाधन तथा चम्बल नदियों की घाटियों व तटवर्ती स्थानों से उपलब्ध हुए हैं। ये हथियार व औज़ार जिनका प्रयोग प्रस्तर युगीन मानव करते थे वे कटुता या अत्यन्त भध्दे, भौण्डे व अनगढ़ थे। इस प्रकार के अवशेषों से प्राप्ति स्थलों में निम्नांकित उल्लेखनीय हैं -

(क) 
गम्भीरी नदी के तट पर चितौड़गढ़ जिले में नगरी, खीट, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अयनार, ऊणचा, देवजडी, हीसेजी सा खेड़ा, बूले खेड़ा आदि स्थान;

(ख)
चम्बल, और बामनीनदी के तट पर भैंसरड़िगड़ व नगधार स्थान;

(ग)
बनास नदी के तट पर भीलवड़ा जिलें में हमीरगढ़, स्वरुपगंज, मंडदिया, बीगोद, जहाजपुर, खुटियास। देवली, मंगरपि, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुगरिया, गिलूड आदि स्थान;

(घ)
लूणी नदी के तट पर जोधपुर में;

(च)
गुहिया और बाँडी नदी की घाटी में सिंगारी व पाली स्थान, मारवाड़ में पीचरु, भाँडेल, धनवासनी, सजिता, धनेरी, भेटान्दा, दुन्दास, गोलियो, पीपाड़, खीमसर, उम्मेद-नगर आदि स्थान;

(छ)
बनास नदी के तट पर तैंरु जिले में भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, लियालपुरा, पच्चर, तरावट, गोगासला, भरनी, आदि स्थान;

(ज)
गागारोन (जिला झालाबाड़), गोविन्दगढ़ (अजमेर ज़िले में सागरमती नदी तट पर), कोकानी (कोटा ज़िले में परवन नदी तट पर), आदि अन्य स्थान।

विशेषताएँ - भारतीय पुरातत्व का सर्वेक्षण (१९५८-६०) के आधार पर सत्यप्रकाश व दशरथ शर्मा ने उपर्युक्त स्रोतों के आधार पर राजस्थान में प्रस्तरयुगीन मानव की सभ्यता पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि "प्रस्तर युगीन मानव का राजस्थान में आहार शिकार किए हुए बनैले जानवरों का मांस आदि प्रकृति द्वारा उपजाए क़ंद, मूल, फल आदि थे। इस काल का मनुष्य अपने मृतकों को जानवरों पक्षियों और मछलियों के लिए मैदान या पानी में फेंक दिया करता था।"

Top

 

राजस्थान में प्रागैतिहासिक प्रस्तर-धातु युग

स्तोत्र

गोपीनाथ शर्मा ने राजस्थान में प्रस्तर धातु युग के प्रमुख स्रोत उखन्न से उपलब्ध दो केन्द्रों - कालीबंगा तथा आहड़ का उल्लेख करते हुए अपना मत व्यक्त किया है कि -"अब तक जो हमने राजस्थान के बारे में जानने का मार्ग ढूँढ़ा वह तमपूर्ण था। आगे चल कर मानव इन स्तरों से आगे बढ़ा और राजस्थानी सभ्यता की गोधूली की आभा स्पष्ट दिखाई देने लगी। ॠग्वेद काल से शायद सदियों पूर्व 'आहड़' (उदयपुर के निकट) तथा हृषद्वती और सरस्वती (गंगानगर के निकट) नदियों के काँठे (किनारे) जीवन लहरें मारता हुआ दिखाई देने लगा। इन काँठों पर मानव-संस्कृति सक्रिय थी और कुछ अंश में हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो की सभ्यता के समकक्ष तथा समकालीन सी थी। आज से पाँच छ: हज़ार वर्ष पूर्व इन नदी घाटियों में बसकर मानव पशु पालने, भाण्डे बनाने, खिलौने तैयार करने, मकान-निर्माण करने आदि कलाओं को जान गया था। इस सुंदर अतीत को समझने के लिए कालीबंगा व आधारपुर (आहड़) में उपलब्ध सामग्री का अध्ययन करना होगा।"

Top

 

कालीबंगा का सांस्कृतिक महत्व व राजस्थान का मानव सभ्यता के विकास में योगदान

सरस्वती तट पर कालीबंगा - राजस्थान के गंगानगर ज़िले में स्थित कालीबंगा स्थान पर उखन्न द्वारा (१९६१ ई. के मध्य किए गए) २६ फ़िट ऊँची पश्चिमी थेड़ी (टीले) से प्राप्त अवशेषों से विदित होता है कि लगभग ४५०० वर्ष पूर्व यहाँ सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पा कालीन सभ्यता फल-फूल रही थी। कालीबंगा गंगानगर ज़िले में सूरतगढ़ के निकट स्थित है। यह स्थान प्राचीन काल की नदी सरस्वती (जो कालांतर में सूख कर लुप्त हो गई थी) के तट पर स्थित था। यह नदी अब घग्घर नदी के रुप में है। सतलज उत्तरी राजस्थान में समाहित होती थी। सूरतगढ़ के निकट नहर-भादरा क्षेत्र में सरस्वती व हृषद्वती का संगम स्थल था। स्वंय सिंधु नदी अपनी विशालता के कारण वर्षा ॠतु में समुद्र जैसा रुप धारण कर लेती थी जो उसके नामकरण से स्पष्ट है। हमारे देश भारत में "र्तृधर सभ्यता" का मूलत: उद्भव विकास एवं प्रसार "सप्तसिन्धव" प्रदेश में हुआ तथा सरस्वती उपत्यका का उसमें विशिष्ट योगदान है। सरस्वती उपत्यका (घाटी) सरस्वती एवं हृषद्वती के मध्य स्थित "ब्रह्मवर्त" का पवित्र प्रदेश था जो मनु के अनुसार "देवनिर्मित" था। धनधान्य से परिपूर्ण इस क्षेत्र में वैदिक ॠचाओं का उद्बोधन भी हुआ। सरस्वती (वर्तमान में घग्घर) नदियों में उत्तम थी तथा गिरि से समुद्र में प्रवेश करती थी। ॠग्वेद (सप्तम मण्डल, २/९५) में कहा गया है-"एकाचतत् सरस्वती नदी नाम शुचिर्यतौ। गिरभ्य: आसमुद्रात।।" सतलज उत्तरी राजस्थान में सरस्वती में समाहित होती थी।

सी.एप. ओल्डन ( C.F. OLDEN ) ने ऐतिहासिक और भौगोलिक तथ्यों के आधार पर बताया कि घग्घर हकरा नदी के घाट पर ॠग्वेद में बहने वाली नदी सरस्वती 'हृषद्वती' थी। तब सतलज व यमुना नदियाँ अपने वर्तमान पाटों में प्रवाहित न होकर घग्घर व हसरा के पाटों में बहती थीं।

महाभारत काल तक सरस्वती लुप्त हो चुकी थी और १३वीं शती तक सतलज, व्यास में मिल गई थी। पानी की मात्र कम होने से सरस्वती रेतीले भाग में सूख गई थी। ओल्डन महोदय के अनुसार सतलज और यमुना के बीच कई छोटी-बड़ी नदियाँ निकलती हैं। इनमें चौतंग, मारकंडा, सरस्वती आदि थी। ये नदियाँ आज भी वर्षा ॠतु में प्रवाहित होती हैं। राजस्थान के निकट ये नदियाँ निकल कर एक बड़ी नदी घग्घर का रुप ले लेती हैं। आग चलकर यह नदी पाकिस्तान में हकरा, वाहिद, नारा नामों से जानी जाती है। ये नदियाँ आज सूखी हुई हैं - किन्तु इनका मार्ग राजस्थान से लेकर करांची और पूर्व कच्छ की खाड़ी तक देखा जा सकता है।

वाकणकर महाशय के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर २०० से अधिक नगर बसे थे, जो हड़प्पाकालीन हैं। इस कारण इसे 'सिंधुघाटी की सभ्यता' के स्थान पर 'सरस्वती नदी की सभ्यता' कहना चाहिए। मूलत: घग्घर-हकरा ही प्राचीन सरस्वती नदी थी जो सतलज और यमुना के संयुक्त गुजरात तरु बहती थी जिसका पाट (चौड़ाई) ब्रह्मपुत्र नदी से बढ़कर ८ कि.मी. था। वाकणकर के अनुसार सरस्वती नदी २ लाख ५० हजार वर्ष पूर्व नागौर, लूनासर, आसियाँ, डीडवाना होते हुए लूणी से मिलती थी जहाँ से वह पूर्व में कच्छ का रण नानूरण जल सरोवर होकर लोथल के निकट संभात की काढ़ी में गिरती थी, किंतु ४०,००० वर्ष पूर्व पहले भूचाल आया जिसके कारण सरस्वती नदी मार्ग परिवर्तन कर घग्घर नदी के मार्ग से होते हुए हनुमानगढ़ और सूरतगढ़ के बहावलपुर क्षेत्र में सिंधु नदी के समानान्तर बहती हुई कच्छ के मैदान में समुद्र से मिल जाती थी। महाभारत काल में कौरव-पाण्डव युद्ध इसी के तट पर लड़ा गया। इसी काल में सरस्वती के विलुप्त होने पर यमुना गंगा में मिलने लगी।

Top

 

कालीबंगा से प्राप्त प्रागैतिहासिक हड़प्पा (सिंधु घाटी) सभ्यता के स्रोत के रुप में अवशेष

१९२२ ई. में राखलदास बैनजी एवं दयाराम साहनी के नेतृत्व में मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा (अब पाकिस्तान में लरकाना जिले में स्थित) के उत्पन्न द्वारा हड़प्पा या सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष मिले थे जिनसे ४५०० वर्ष पूर्व की प्राचीन सभ्यता का पता चला था। बाद में इस सभ्यता के लगभग १०० केन्द्रों का पता चला जिनमें राजस्थान का कालीबंगा क्षेत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मोहनजोदड़ो व हड़प्पा के बाद हड़प्पा संस्कृति का कालीबंगा तीसरा बड़ा नगर सिद्ध हुआ है। जिसके एक टीले के उत्खनन द्वारा निम्नांकित अवशेष स्रोत के रुप में मिले हैं जिनकी विशेषताएँ भारतीय सभ्यता के विकास में उनका योगदान स्पष्ट करती हैं -

Top

 

(क) ताँबे के औज़ार व मूर्तियाँ

कालीबंगा में उत्खन्न से प्राप्त अवशेषों में ताँबे (धातु) से निर्मित औज़ार, हथियार व मूर्तियाँ मिली हैं, जो यह प्रकट करती है कि मानव प्रस्तर युग से ताम्रयुग में प्रवेश कर चुका था।

Top

 

(ख) अंकित मुहरें

कालीबंगा से सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता की मिट्टी पर बनी मुहरें मिली हैं, जिन पर वृषभ व अन्य पशुओं के चित्र व र्तृधव लिपि में अंकित लेख है जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। वह लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी।

Top

 

(ग) ताँबे या मिट्टी की बनी मूर्तियाँ, पशु-पक्षी व मानव कृतियाँ

मिली हैं जो मोहनजोदड़ो व हड़प्पा के समान हैं। पशुओं में बैल, बंदर व पक्षियों की मूर्तियाँ मिली हैं जो पशु-पालन, व कृषि में बैल का उपयोग किया जाना प्रकट करता है।

Top

 

(घ) तोल के बाट

पत्थर से बने तोलने के बाट का उपयोग करना मानव सीख गया था।

Top

 

(च) बर्तन

मिट्टी के विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े बर्तन भी प्राप्त हुए हैं जिन पर चित्रांकन भी किया हुआ है। यह प्रकट करता है कि बर्तन बनाने हेतु 'चारु' का प्रयोग होने लगा था तथा चित्रांकन से कलात्मक प्रवृत्ति व्यक्त करता है।

Top

 

(छ) आभूषण

अनेक प्रकार के स्री व पुरुषों द्वारा प्रयुक्त होने वाले काँच, सीप, शंख, घोंघों आदि से निर्मित आभूषण भी मिलें हैं जैसे कंगन, चूड़ियाँ आदि।

Top

 

(ज) नगर नियोजन

मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की भाँति कालीबंगा में भी सूर्य से तपी हुई ईटों से बने मकान, दरवाज़े, चौड़ी सड़कें, कुएँ, नालियाँ आदि पूर्व योजना के अनुसार निर्मित हैं जो तत्कालीन मानव की नगर-नियोजन, सफ़ाई-व्यवस्था, पेयजल व्यवस्था आदि पर प्रकाश डालते हैं।

Top

 

(झ) कृषि-कार्य संबंधी अवशेष

कालीबंगा से प्राप्त हल से अंकित रेखाएँ भी प्राप्त हुई हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि यहाँ का मानव कृषि कार्य भी करता था। इसकी पुष्टि बैल व अन्य पालतू पशुओं की मूर्तियों से भी होती हैं। बैल व बारहसिंघ की अस्थियों भी प्राप्त हुई हैं। बैलगाड़ी के खिलौने भी मिले हैं।

Top

 

(ट) खिलौने

धातु व मिट्टी के खिलौने भी मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की भाँति यहाँ से प्राप्त हुए हैं जो बच्चों के मनोरंजन के प्रति आकर्षण प्रकट करते हैं।

Top

 

(ठ) धर्म संबंधी अवशेष

मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की भाँति कालीबंगा से मातृदेवी की मूर्ति नहीं मिली है। इसके स्थान पर आयाताकार वर्तुलाकार व अंडाकार अग्निवेदियाँ तथा बैल, बारसिंघे की हड्डियाँ यह प्रकट करती है कि यहाँ का मानव यज्ञ में पशु-बलि भी देता था।

Top

 

(ड) दुर्ग (किला)

सिंधु घाटी सभ्यता के अन्य केन्द्रो से भिन्न कालीबंगा में एक विशाल दुर्ग के अवशेष भी मिले हैं जो यहाँ के मानव द्वारा अपनाए गए सुरक्षात्मक उपायों का प्रमाण है।

उपर्युक्त अवशेषों के स्रोतों के रुप में कालीबंगा व सिंधु-घाटी सभ्यता में अपना विशिष्ट स्थान है। कुछ पुरातत्वेत्ता तो सरस्वती तट पर बसे होने के कारण कालीबंगा सभ्यता को 'सरस्वती घाटी सभ्यता' कहना अधिक उपयुक्त समझते हैं क्योंकि यहाँ का मानव प्रागैतिहासिक काल में हड़प्पा सभ्यता से भी कई दृष्टि से उन्नत था। खेती करने का ज्ञान होना, दुर्ग बना कर सुरक्षा करना, यज्ञ करना आदि इसी उन्नत दशा के सूचक हैं। वस्तुत: कालीबंगा का प्रागैतिहासिक सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में यथेष्ट योगदान रहा है।

Top

 

आहड़ का सांस्कृतिक महत्व

आहड़कालीन संस्कृति की स्थिति

राजस्थान में प्राचीन मेवाड़ क्षेत्र का पुरातत्व की दृष्टि से अलग ही महत्व है। इस क्षेत्र की नदियों के तटों पर पाषाण कालीन (प्रस्तर युग) संस्कृतियों के अवशेष के अतिरिक्त अनेक स्थानों पर आहड़कालीन संस्कृतियों के अवशेष भी पाए गए हैं जिनकी पृथक विशेषता है। प्राचीन मेवाड़ में आहड़ (उदयपुर) के समान सभ्यता का विकास मुख्यत: बनास और उसकी सहायक नदियों आहड़, बाग, पिण्ड, बेड़च, गम्भीरी, कोठारी, मानसी, खारी व अन्य छोटी नदियों के किनारे हुआ है इसलिए पुरातत्ववेत्ता इस सभ्यता को बनास घाटी की सभ्यता के नाम से भी पुकारते हैं।

आहड़ को प्राचीन काल में 'ताम्रवती' (ताँबावती) नगरी के नाम से भी पुकारा जाता रहा है। इसका कारण यहाँ हुए ताम्र उपकरणों का विकास ही है। अन्य स्थानों पर भी जहाँ ताँबा पाया गया है। इस संस्कृति के अवशेष मिल हैं। जिन स्थानों पर इस सभ्यता के अवशेष मिले हैं वे 'धूल कोट' के रुप में थे जिन्होंने लम्बे समय तक सभ्यता के अवशेषों को अपने गर्भ में सुरक्षित सँजोए रहता है।

पुरातत्ववेत्ता हंसमुख धीरजलाल सांकलिया महोदय के अनुसार तीन ओर से अरावली पर्वतमालाओं से राजस्थान का यह भाग बनास और उसकी सहायक नदियों तथा नालों के जल से पूरित वन-सम्पदा एवं खनिज सम्पदा से भरपूर, उत्तम वर्षा व संतुलित जलवायु से युक्त होने के कारण प्राचीनकाल से ही प्रागैतिहासिक मानव का आवास-स्थल रहा है। उत्खन्न कार्य आहड़ में योजनाबद्ध रुप से १९५२-१९५६ के मध्य राजस्थान के राजकीय संग्रहालय एवं पुरातत्व विभाग के तत्कालीन अधीरक्षक रत्नचंद अग्रवाल द्वारा करवाया गया था।

Top

 

आहड़ सभ्यता के केन्द्र व काल

प्रारम्भ में इस स्थान पर पाए गए अवशेषों से आधार पर कार्बन - १४ को आधार मानते हुए इस सभ्यता का काल ईसा से पूर्व १२०० से १८०० वर्ष माना गया। १९५६ के बाद भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने बनास तथा उसकी सहायक नदियों के किनारे सर्वेक्षण कार्य प्रारम्भ किया जिसके फलस्वरुप उदयपुर, चितौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर तथा अन्य ज़िलों में भी लगभग ४० से अधिक स्थानों पर आहड़ के समकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए।

१९६० में बी.बी. लाल ने उदयपुर के दक्षिणोत्तर में ७२ कि.मी. दूर बनास के किनारे 'गिलूंड' में आहड़ समकालीन संस्कृति के अवशेषों को खोज निकाला। बनास धारी में आहड़कालीन संस्कृति के अवशेषों के एक के बाद एक निरन्तर मिलते रहने से प्रेरित होकर १९६८ में सांगलिया महोदय के नेतृत्व में विशाल पैमाने पर सामूहिक खोज का आयोजन किया गया। इस खोज हल में राजस्थान पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निरक्षक एस.पी. श्रीवास्तव, आॅस्ट्रेलिया के मेलबोर्न विश्वविद्यालय के विलियम कुलीसेन, काजी, निक्सन तथा राजस्थान पुरातत्व विभाग के चक्रवर्ती विजयकुमार और सम्मिलित थे। इस दल ने अपने शोध-सर्वेक्षण से सिद्ध किया कि आहड़ कालीन संस्कृति के अवशेष राजस्थान के उदयपुर, चितौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर, टौंक और जयपुर ज़िले में तो उपलब्ध है ही, साथ ही इसी के आधार पर राजस्थान के पुरातत्व विभाग के कोटपूतली, नीम का थाना व गणेश्वर में उत्खनन कार्य कराया जहाँ O.C.P.B.R.P . और N.B.P. चित्रित लाल व काले मटभाण्डों, सफ़ेद माँडने व चित्रित ग्रेवियर प्राप्त हुए हैं। १९७९ चितौड़गढ़ राजकीय संग्रहालय के परीक्षक कन्हैयालाल मीणा ने पुन: बनास व उसकी सहायक नदियों के किनारे पर आहड़कालीन संस्कृति का शोध-सर्वेक्षण किया जिससे इन शोध-केन्द्रों की संख्या लगभग ६० हो गई है। मीणा को सर्वेक्षण में चित्तौड़गढ़ के 'पिण्ड' ग्राम में 'ताँबे' की प्राचीन कुल्हाड़ी मिली। भीलवाड़ा में भी सर्वेक्षण किया गया। इन केन्द्रों से विभिन्न प्रकार के अनेक अवशेष उपलब्ध हुए है।

Top

 

स्रोत-सामग्री अवशेषों के आधार पर आहड़-संस्कृति की विशेषताएँ

उत्खनन स्थल

आहड़, उदयपुर के निकट वह कस्बा है जहाँ पर लगभग ४,००० वर्ष पूर्व प्रस्तर युगीन-मानव के रहने के तथ्य मिले हैं। आहड़ के दो टीलों की डॉ. सांकलिया (पूना विश्वविद्यालय) तथा राजस्थान सरकार द्वारा खुदाई की गई थी। आहड़ का एक अन्य नाम 'ताम्रवती' (ताँबानगरी) भी था जो यहाँ ताँबे के औज़ारों के बनने का केन्द्र प्रमाणित होता है। १०वीं - ११वीं शताब्दी में इसे 'आधारपुर' या 'आधारदुर्ग' के नाम से जाना जाता था जिसे स्थानीय भाषा में 'धूलकोट' कहा जाता था। ये 'धूलकोट' प्राचीन नगरी के अवशेषों को अपने गर्भ में छिपाए हुए थे। बड़ा 'धूलकोट' १५०० फ़िट लम्बा और ४५ फ़िट ऊँचा है जिससे खाइयाँ खोद कर कई अवशेष प्राप्त हुए हैं तथा बस्तियों के कई स्तर मिलें हैं।

Top

 

बस्तियों के स्तर

पहले स्तर में कुछ मिट्टी की दीवारें मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा पत्थर के ढेर प्राप्त हुए हैं। दूसरे स्तर की बस्ती से जो प्रथम स्तर पर ही बसी है, कुछ कूट कर तैयार की गई है दीवारें और मिट्टी के बर्तन के टुकड़े मिले हैं। तीसरी बस्ती में कुछ चित्रित बर्तन और उनका घरों में प्रयोग होना प्रमाणित होता है। चौथी बस्ती के स्तर में एक बर्तन से दो ताँबे की कुल्हाड़ियाँ मिली हैं। इस प्रकार इन स्तरों पर उत्तरोत्तर चार और बस्तियों के स्तर मिले हैं। जिनमें मकान बनाने की पद्धति, बर्तन बनाने की विधि आदि में परिवर्तन दिखाई देता है। ये सभी स्तर एक-दूसरे स्तर पर बनते और बिगड़ते गए जो हमें आहड़ की ऐतिहासिकता समझने में बड़े सहायक हैं। ये समूची बस्तियाँ 'आहड़-नदी की सभ्यता' कही जाती हैं।

Top

 

विभिन्न बस्तियों के अवशेष

आहड़ की खुदाई में कई घरों की स्थिति का पता चला है। सबसे प्रथम बस्ती नदी के ऊपरी भाग की भूमि पर बसी थी जिस पर उत्तरोत्तर बस्तियाँ बनती चली गई। यहाँ के के मुलायम काले पत्थरों से मकान बनाए गए थे। नदी के तट सेलाई गई मिट्टी से मकानों को बनाया जाता था। यहाँ बड़े कमरों की लम्बाई - चौड़ाई ३३ न् २० फ़िट तक चौड़ी होती थी। इनकी छतें बाँसे से ढकी जाती थीं। मकानों के फ़र्श को काली मिट्टी के साथ नदी का बालू को मिलाकर बनाया जाता था। कुछ मकानों में २ या ३ चूहे और एक मकान में तो ६ चूहों की संख्या भी देखी गई। इससे पता चलता है कि आहड़ में बड़े भाण्डें भी गड़े हुए मिले हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में 'गोरी' या 'कोठे' कहा जाता है। इस संख्या से प्राचीन आहड़ की समृद्धि भी प्रमाणित होती है।

आहड़ के द्वितीय काल की खुदाई में ताँबे की मूद्राएँ और तीन मुहरें प्राप्त हुई हैं। इनमें कुछ मुद्राएँ अस्पष्ट हैं किंतु एक मुद्रा में त्रिशूल खुदा हुआ है और दूसरी में खड़ा हुआ 'अपोलो' है जिसके हाथों में तीर तथा तरकस हैं। इस मुद्रा के किनारे यूनानी भाषा में कुछ लिखा हुआ है जिससे इसका काल दूसरी सदी ईसा पूर्व आँका जाता है। कई मकानों की रक्षार्थ स्फटिक पत्थरों के बड़े टुकड़े काम में लाए जाते थे और उन्हीं से पत्थर के औज़ार बनाए जाते थे। यहाँ की सभ्यता के प्रथम चरण से सम्बन्धित प्रस्तर के छीलने, छेद करने तथा काटने के औज़ार पाए कुछ ऐसे औज़ार चतुष्कोण, गोल व बेडौल आकृति के मिले हैं जो आकार में छोटे हैं किन्तु जिनके एक या दो किनारे बड़े तेज दिखाई देते हैं।

Top

 

औज़ार वा आभूषण

चारों ओर उभरे तथा पैने किनारों के उपकरण भी यहाँ मिले हैं जो चमड़े या हड्डी छीलने के प्रयोग में लाए जाते होगें। इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त अवशेषों में पत्थरों के गोले शिलाएँ, गदाएँ, ओखलियाँ आदि भी मिले हैं। मूल्यवान पत्थरों जैसे गोमेद, स्फटिक आदि से आहड़ निवासी गोल मणियाँ बनाते थे। ऐसी मणियों के साथ काँच, पक्की-मिट्टी, सीप और हड्डी के गोलाकार छेद वाले अंडे भी लाए जाते थे। इनको सुरक्षित करने हेतु मिट्टी के बर्तनों या टोकरियों का प्रयोग किया जाता था। इनका आभूषण बनाने में उपयोग किया जाता था तथा ताबीज़ की तरह लटकाने के लिए किया जाता था। इनके ऊपर सजावट का काम भी किया जाता था। आधार में ये गोल, चपटे, चतुष्कोण व षट्कोण होते थे। ये अवशेष आहड़ सभ्यता के दूसरे चरण की ज्ञात होती है।

Top

 

मूर्तियाँ व पूजा-सामग्री

अन्य अवशेषों में चमड़े के टुकड़े, मिट्टी के पूजा-पात्र। चूड़ियाँ तथा खिलौने हैं। पूजा-पात्रों के किनारे ऊँचे व नीचे होने से ज्ञात होता है कि इनमें दीपक रखने की व्यवस्था की जाती थी। खिलौनों में बैल, हाथी, चक्र आदि प्रमुख है। ये अवशेष आहड़-सभ्यता से समृद्ध काल १८००ई. से पू. से १२०० ई.पू. से संबद्ध है। इस युग का मानव कच्ची मिट्टी के ढलवाँ छतों वाले मकान बना कर रहता था तथा वह मांसाहारी था किंतु आगे चलकर वह गेहूँ का आहार करने लगा था। इस काल में लौह धातु का प्रयोग किया जाने लगा था।

Top

 

कृषि व बर्तन बनाने की कला

आहड़ सभ्यता के लोग कृषि से परिचित थे। यहाँ से मिलने वाले बड़े-बड़े भाण्डे तथा अन्न पीसने के पत्थर प्रमाणित करते हैं कि ये लोग अन्न उत्पादन करते थे और उसको पका कर खाते थे। एक बड़ कमरे में जो बड़ी-बड़ी भट्टियाँ मिली हैं वह सामूहिक भोज की पुष्टि करती हैं। इस भाग में वर्षा अधिक होने और नदी पास में होने से सिंचाई की सुविधा यह सिद्ध करती है कि वहाँ भोजन सामग्री प्रभूत मात्रा में प्राप्त रही होगी। आहड़ के निवासियों को बर्तन बनाने की कला आती थी। यहाँ से मिट्टी की कटोरियाँ, रकबियाँ, तश्तरियाँ, प्याले, मटके, कलश आदि बड़ी संख्या में मिलें हैं। साधारणतया इन बर्तनों को चाक से बनाते थे जिन पर चित्रांकन उभरी हुई मिट्टी की रेखा से किया जाता था और उसे 'ग्लेज' करके चमकीला बना दिया जाता था। बैठक वाली तश्तरियाँ और पूजा में काम आने वाली धूपदानियाँ ईरानियन शैली की बनती थी जिनमें हमें आहड़ियों का संबंध ईरानी गतिविधि से होने की सम्भावना प्रकट होती है।

Top

 

मृतक का संस्कार

मृतक संस्कार के संबंध में आहड़ के उत्खन्न के ऊपरी स्तर से पता चलता है कि पहली व दूसरी शताब्दी में मृतक को गाड़ा जाता था। मृतक के अस्थि पंजरों से ज्ञात होता है कि उसे आभूषणों सहित दफ़नाया जाता था। उसका सिर उत्तर की ओर व पैर दक्षिण में रखे जाते थे।

उपर्युक्त अवशेष रुपी स्रोतों से प्रागैतिहासिक काल की सभ्यता एवं संस्कृति की भाँति आहड़ संस्कृति भी प्रागैतिहासिक कालीन सांस्कृतिक विकास की महत्वपूर्ण कड़ियाँ सिद्ध होती हैं जिनसे अनेक नवीन जानकारियाँ मिलती हैं।

 

  विषय सूची   


Top

Copyright IGNCA© 2003 में प्रागैतिहासिक प्रस्तर-धातु युग

स्तोत्र

गोपीनाथ शर्मा ने राजस्थान में प्रस्तर धातु युग के प्रमुख स्रोत उखन्न से उपलब्ध दो केन्द्रों - कालीबंगा तथा आहड़ का उल्लेख करते हुए अपना मत व्यक्त किया है कि -"अब तक जो हमने राजस्थान के बारे में जानने का मार्ग ढूँढ़ा वह तमपूर्ण था। आगे चल कर मानव इन स्तरों से आगे बढ़ा और राजस्थानी सभ्यता की गोधूली की आभा स्पष्ट दिखाई देने लगी। ॠग्वेद काल से शायद सदियों पूर्व 'आहड़' (उदयपुर के निकट) तथा हृषद्वती और सरस्वती (गंगानगर के निकट) नदियों के काँठे (किनारे) जीवन लहरें मारता हुआ दिखाई देने लगा। इन काँठों पर मानव-संस्कृति सक्रिय थी और कुछ अंश में हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो की सभ्यता के समकक्ष तथा समकालीन सी थी। आज से पाँच छ: हज़ार वर्ष पूर्व इन नदी घाटियों में बसकर मानव पशु पालने, भाण्डे बनाने, खिलौने तैयार करने, मकान-निर्माण करने आदि कलाओं को जान गया था। इस सुंदर अतीत को समझने के लिए कालीबंगा व आधारपुर (आहड़) में उपलब्ध सामग्री का अध्ययन करना होगा।"

कालीबंगा का सांस्कृतिक महत्व व राजस्थान का मानव सभ्यता के विकास में योगदान

सरस्वती तट पर कालीबंगा - राजस्थान के गंगानगर ज़िले में स्थित कालीबंगा स्थान पर उखन्न द्वारा (१९६१ ई. के मध्य किए गए) २६ फ़िट ऊँची पश्चिमी थेड़ी (टीले) से प्राप्त अवशेषों से विदित होता है कि लगभग ४५०० वर्ष पूर्व यहाँ सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पा कालीन सभ्यता फल-फूल रही थी। कालीबंगा गंगानगर ज़िले में सूरतगढ़ के निकट स्थित है। यह स्थान प्राचीन काल की नदी सरस्वती (जो कालांतर में सूख कर लुप्त हो गई थी) के तट पर स्थित था। यह नदी अब घग्घर नदी के रुप में है। सतलज उत्तरी राजस्थान में समाहित होती थी। सूरतगढ़ के निकट नहर-भादरा क्षेत्र में सरस्वती व हृषद्वती का संगम स्थल था। स्वंय सिंधु नदी अपनी विशालता के कारण वर्षा ॠतु में समुद्र जैसा रुप धारण कर लेती थी जो उसके नामकरण से स्पष्ट है। हमारे देश भारत में "र्तृधर सभ्यता" का मूलत: उद्भव विकास एवं प्रसार "सप्तसिन्धव" प्रदेश में हुआ तथा सरस्वती उपत्यका का उसमें विशिष्ट योगदान है। सरस्वती उपत्यका (घाटी) सरस्वती एवं हृषद्वती के मध्य स्थित "ब्रह्मवर्त" का पवित्र प्रदेश था जो मनु के अनुसार "देवनिर्मित" था। धनधान्य से परिपूर्ण इस क्षेत्र में वैदिक ॠचाओं का उद्बोधन भी हुआ। सरस्वती (वर्तमान में घग्घर) नदियों में उत्तम थी तथा गिरि से समुद्र में प्रवेश करती थी। ॠग्वेद (सप्तम मण्डल, २/९५) में कहा गया है-"एकाचतत् सरस्वती नदी नाम शुचिर्यतौ। गिरभ्य: आसमुद्रात।।" सतलज उत्तरी राजस्थान में सरस्वती में समाहित होती थी।

सी.एप. ओल्डन ( C.F. OLDEN ) ने ऐतिहासिक और भौगोलिक तथ्यों के आधार पर बताया कि घग्घर हकरा नदी के घाट पर ॠग्वेद में बहने वाली नदी सरस्वती 'हृषद्वती' थी। तब सतलज व यमुना नदियाँ अपने वर्तमान पाटों में प्रवाहित न होकर घग्घर व हसरा के पाटों में बहती थीं।

महाभारत काल तक सरस्वती लुप्त हो चुकी थी और १३वीं शती तक सतलज, व्यास में मिल गई थी। पानी की मात्र कम होने से सरस्वती रेतीले भाग में सूख गई थी। ओल्डन महोदय के अनुसार सतलज और यमुना के बीच कई छोटी-बड़ी नदियाँ निकलती हैं। इनमें चौतंग, मारकंडा, सरस्वती आदि थी। ये नदियाँ आज भी वर्षा ॠतु में प्रवाहित होती हैं। राजस्थान के निकट ये नदियाँ निकल कर एक बड़ी नदी घग्घर का रुप ले लेती हैं। आग चलकर यह नदी पाकिस्तान में हकरा, वाहिद, नारा नामों से जानी जाती है। ये नदियाँ आज सूखी हुई हैं - किन्तु इनका मार्ग राजस्थान से लेकर करांची और पूर्व कच्छ की खाड़ी तक देखा जा सकता है।

वाकणकर महाशय के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर २०० से अधिक नगर बसे थे, जो हड़प्पाकालीन हैं। इस कारण इसे 'सिंधुघाटी की सभ्यता' के स्थान पर 'सरस्वती नदी की सभ्यता' कहना चाहिए। मूलत: घग्घर-हकरा ही प्राचीन सरस्वती नदी थी जो सतलज और यमुना के संयुक्त गुजरात तरु बहती थी जिसका पाट (चौड़ाई) ब्रह्मपुत्र नदी से बढ़कर ८ कि.मी. था। वाकणकर के अनुसार सरस्वती नदी २ लाख ५० हजार वर्ष पूर्व नागौर, लूनासर, आसियाँ, डीडवाना होते हुए लूणी से मिलती थी जहाँ से वह पूर्व में कच्छ का रण नानूरण जल सरोवर होकर लोथल के निकट संभात की काढ़ी में गिरती थी, किंतु ४०,००० वर्ष पूर्व पहले भूचाल आया जिसके कारण सरस्वती नदी मार्ग परिवर्तन कर घग्घर नदी के मार्ग से होते हुए हनुमानगढ़ और सूरतगढ़ के बहावलपुर क्षेत्र में सिंधु नदी के समानान्तर बहती हुई कच्छ के मैदान में समुद्र से मिल जाती थी। महाभारत काल में कौरव-पाण्डव युद्ध इसी के तट पर लड़ा गया। इसी काल में सरस्वती के विलुप्त होने पर यमुना गंगा में मिलने लगी।



राजस्थान की प्रागैतिहासिक संस्कृतिRAS एवं Group-A परीक्षाओं के लिए संकलित अध्ययन-सामग्रीराजस्थान में मानव-निवास के प्रमाण पुरापाषाण काल से मिलते हैं। यहाँ पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण, ताम्रपाषाण तथा हड़प्पा-संबंधित संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। �महत्वपूर्ण सावधानी: किसी स्थल का काल और विशेषता अलग-अलग पुस्तकों में थोड़ी भिन्न मिल सकती है। परीक्षा में RPSC/राजस्थान पुरातत्व विभाग द्वारा स्वीकृत सामान्य तथ्य और प्रचलित अभिमत को प्राथमिकता दें।1. काल-विभाजनसमय-सीमाएँ अनुमानित हैं; पुरातात्विक संस्कृतियों का विकास एक-दूसरे से पूरी तरह अलग और अचानक नहीं हुआ था।2. पुरापाषाण संस्कृतिराजस्थान में पुरापाषाण उपकरण मुख्यतः नदी-घाटियों, जलस्रोतों और कंकरीले क्षेत्रों में मिले हैं। इस काल के लोग शिकारी एवं खाद्य-संग्राहक थे तथा क्वार्टजाइट जैसे पत्थरों से हस्त-कुठार, क्लीवर, चॉपर और खुरचनी बनाते थे।प्रमुख क्षेत्रचम्बल घाटी: पूर्वी राजस्थान में पाषाण उपकरणों के प्रमाण।बनास घाटी: नदी-तटीय क्षेत्रों में प्रारम्भिक मानव गतिविधियों के साक्ष्य।डीडवाना क्षेत्र: मरुस्थलीय भाग में पाषाणकालीन उपकरणों और पुरानी झील-परिस्थितियों के प्रमाण।दर, भरतपुर: पाषाणकालीन संस्कृति से संबंधित स्थल के रूप में परीक्षा में पूछा जाता है। �परीक्षा-बिंदुपुरापाषाण मानव का मुख्य जीवन-आधार—शिकार एवं खाद्य-संग्रह।प्रमुख औजार—हस्त-कुठार, क्लीवर, चॉपर और खुरचनी।स्थायी कृषि-आधारित ग्राम इस काल की प्रमुख विशेषता नहीं थी।3. मध्यपाषाण संस्कृतिमध्यपाषाण काल में औजार छोटे और अधिक धारदार हो गए, जिन्हें सूक्ष्म पाषाण उपकरण या microliths कहा जाता है। इस काल में शिकार के साथ मछली पकड़ना, जंगली वनस्पतियों का संग्रह और पशुपालन की प्रारम्भिक अवस्था दिखाई देती है।बागोरजिला: भीलवाड़ा।नदी: कोठारी नदी।महत्त्व: राजस्थान का अत्यंत महत्वपूर्ण मध्यपाषाण स्थल।यहाँ शिकार, मछली पकड़ने और पशुपालन से संबंधित साक्ष्य प्राप्त हुए।बागोर को भारत के प्रारम्भिक पशुपालन स्थलों में गिना जाता है। �बागोर की खुदाई से यह संकेत मिलता है कि मानव समुदाय धीरे-धीरे पूर्णतः घुमंतू जीवन से अधिक स्थायी जीवन की ओर बढ़ रहे थे।तिलवाड़ाजिला: बाड़मेर।नदी: लूनी नदी।काल: मुख्यतः मध्यपाषाण।यहाँ सूक्ष्म पाषाण उपकरण और पशु-अस्थियों के प्रमाण मिले हैं। �डीडवानाडीडवाना क्षेत्र में पाषाणकालीन उपकरणों के साथ पुरानी झीलों और जलवायु-परिवर्तन से संबंधित महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय साक्ष्य मिले हैं। यह स्थल पश्चिमी राजस्थान के प्रागैतिहासिक अध्ययन में विशेष महत्त्व रखता है।बागोर और तिलवाड़ा में अंतर4. नवपाषाण चरणनवपाषाण काल की पहचान कृषि, पशुपालन, स्थायी बस्तियों, घिसे-पॉलिश किए हुए पत्थर के औजार और मृद्भांडों से होती है। राजस्थान में नवपाषाण के स्वतंत्र और व्यापक प्रमाण मध्य गंगा घाटी या दक्षिण भारत की तुलना में कम हैं, इसलिए राजस्थान के संदर्भ में मध्यपाषाण से ताम्रपाषाण संक्रमण अधिक परीक्षा-उपयोगी है।इस संक्रमण में मानव ने:पशुओं को पालतू बनाना शुरू किया।अनाज उत्पादन और भंडारण की ओर कदम बढ़ाया।अस्थायी शिविरों के स्थान पर अधिक स्थायी बस्तियाँ बसाईं।पत्थर के साथ ताँबे का उपयोग आरम्भ किया।5. ताम्रपाषाण संस्कृतिताम्रपाषाण संस्कृति में पत्थर और ताँबे दोनों के औजारों का प्रयोग मिलता है। राजस्थान में इसका सबसे प्रमुख विकास दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में हुआ।आहड़ या बनास संस्कृतिसामान्य परिचयमुख्य स्थल: आहड़, उदयपुर।क्षेत्र: बनास और उसकी सहायक नदियों की घाटियाँ।अन्य नाम: आहड़ संस्कृति, बनास संस्कृति।आहड़ का प्राचीन नाम: ताम्रवती या ताँबावती।स्थानीय नाम: धूलकोट।आहड़ संस्कृति का विकास बनास, आहड़, बेड़च, गम्भीरी, कोठारी, खारी आदि नदियों के किनारे हुआ। �आहड़ क्षेत्र अरावली पर्वत, जलस्रोतों और ताँबे के खनिजों की उपलब्धता के कारण प्रारम्भिक धातु-आधारित बस्तियों के लिए उपयुक्त था। आहड़ में व्यवस्थित उत्खनन 1952–1956 के बीच कराया गया था। �आहड़ संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँकाले-लाल मृद्भांड।मृद्भांडों पर सफेद रंग से चित्रांकन।ताँबे के औजार और आभूषण।कृषि एवं पशुपालन।पत्थर, मिट्टी और कच्ची ईंटों से बने आवास।चूल्हे, भंडारण-पात्र और घरेलू गतिविधियों के प्रमाण।बनास नदी-तंत्र पर आधारित ग्रामीण बस्तियाँ।आहड़ से जुड़े प्रमुख स्थलआहड़—उदयपुर।गिलूंड—राजसमंद।बालाथल—उदयपुर।ओझियाना—भीलवाड़ा।मण्डिया—दक्षिण-पूर्वी राजस्थान से संबंधित क्षेत्रीय संदर्भ।गिलूंडजिला: राजसमंद।संस्कृति: बनास/आहड़ संस्कृति।यह आहड़ संस्कृति के प्रमुख स्थलों में गिना जाता है।यहाँ आवासीय संरचनाएँ, मृद्भांड और कृषि-आधारित जीवन के प्रमाण मिले हैं।बालाथलजिला: उदयपुर।संस्कृति: ताम्रपाषाण।यह दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के ग्रामीण-धातु उपयोगी समुदायों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।यहाँ कृषि, पशुपालन, आवासीय संरचनाओं और धातु-उपयोग से जुड़े साक्ष्य मिले हैं।6. गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृतिगणेश्वरजिला: सीकर।संस्कृति: ताम्रपाषाण।क्षेत्र: कांतली नदी का क्षेत्र।विशेषता: ताँबे के औजारों की समृद्ध परंपरा।इसे प्रायः “ताम्र संस्कृति का जनक” या राजस्थान की प्रमुख ताम्र संस्कृति के रूप में वर्णित किया जाता है। �गणेश्वर क्षेत्र अरावली के ताँबा-समृद्ध क्षेत्र के निकट था। यहाँ से ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, तीरों के फलक, मछली पकड़ने के काँटे, छल्ले और अन्य वस्तुएँ मिलने का उल्लेख मिलता है।गणेश्वर-जोधपुरा की विशेषताएँताँबे का व्यापक उपयोग।ग्रामीण बस्ती और शिल्प-उत्पादन।कृषि एवं पशुपालन।हड़प्पा सभ्यता से संपर्क की संभावना।ताँबे की वस्तुओं का दूरस्थ क्षेत्रों में विनिमय।आहड़ और गणेश्वर में अंतर7. कालीबंगा और हड़प्पा संस्कृतिकालीबंगाजिला: हनुमानगढ़।नदी: घग्घर नदी।संस्कृति: प्राक्-हड़प्पा तथा हड़प्पा।अर्थ: काली चूड़ियाँ।महत्त्व: राजस्थान में सिंधु-सरस्वती/हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख केंद्र।कालीबंगा की प्रमुख विशेषताएँप्राक्-हड़प्पा और परिपक्व हड़प्पा—दोनों चरणों के प्रमाण।नियोजित नगर-व्यवस्था।दुर्ग और निचले नगर का विभाजन।अग्निवेदियों के प्रमाण।जुते हुए खेत का प्रसिद्ध प्रमाण।कच्ची ईंटों का प्रयोग।चूड़ियाँ, मृद्भांड और मुहरें।शवाधान परंपराओं के प्रमाण।कालीबंगा का जुता हुआ खेत भारतीय उपमहाद्वीप की प्रारम्भिक कृषि-परंपराओं के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। हड़प्पा स्थलों की सूची में कालीबंगा के साथ आहड़ और गिलूंड को जोड़ना सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि आहड़-बनास संस्कृति हड़प्पा संस्कृति से अलग क्षेत्रीय संस्कृति थी, यद्यपि दोनों के बीच संपर्क के संकेत मिलते हैं।बारोरजिला: श्रीगंगानगर क्षेत्र।नदी-क्षेत्र: घग्घर-हकरा प्रणाली।संस्कृति: हड़प्पा-संबंधित।यहाँ से प्राक्-हड़प्पा/हड़प्पा चरण की सामग्री के प्रमाणों का उल्लेख मिलता है।8. अन्य परीक्षा-उपयोगी स्थल9. नदी-स्थल मिलानयह मिलान RAS प्रारम्भिक परीक्षा में अत्यंत उपयोगी है:बागोर—कोठारी नदीतिलवाड़ा—लूनी नदीआहड़—बनास नदी-तंत्रगणेश्वर—कांतली नदीकालीबंगा—घग्घर नदीबैराठ—बाणगंगा क्षेत्र, यद्यपि यह मुख्यतः ऐतिहासिक-मौर्य-बौद्ध स्थल है, प्रागैतिहासिक स्थल नहीं।10. मृद्भांड एवं औजारकाले-लाल मृद्भांडकाले-लाल मृद्भांड आहड़-बनास संस्कृति की प्रमुख पहचान माने जाते हैं। इन पर सामान्यतः सफेद रंग से ज्यामितीय या सरल सजावटी आकृतियाँ बनाई जाती थीं।ताँबे के औजारगणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति में ताँबे की वस्तुओं की अधिकता मिलती है। इनमें कुल्हाड़ियाँ, तीरों के फलक, छल्ले, मछली पकड़ने के काँटे और अन्य उपकरण शामिल किए जाते हैं।सूक्ष्म पाषाण उपकरणमध्यपाषाण काल में चर्ट, जैस्पर, अगेट और अन्य कठोर पत्थरों से छोटे औजार बनाए जाते थे। इन्हें लकड़ी या हड्डी में जड़कर संयुक्त औजार भी बनाए जा सकते थे।11. RAS मुख्य परीक्षा के लिए विश्लेषणप्रश्न में केवल स्थलों की सूची न लिखें। उत्तर को इस क्रम में प्रस्तुत करें:भूमिका: राजस्थान की भौगोलिक विविधता—अरावली, नदी-घाटियाँ, मरुस्थल और खनिज-संपदा—ने प्रागैतिहासिक मानव को अलग-अलग जीवन-पद्धतियाँ विकसित करने में सहायता दी।कालक्रम: पुरापाषाण से ताम्रपाषाण और हड़प्पा चरण तक विकास।स्थल-विश्लेषण: बागोर, तिलवाड़ा, आहड़, गणेश्वर और कालीबंगा।आर्थिक जीवन: शिकार, संग्रह, पशुपालन, कृषि, ताँबा-कर्म और विनिमय।सांस्कृतिक विशेषताएँ: मृद्भांड, आवास, अग्नि-परंपरा, शवाधान और नगर-योजना।निष्कर्ष: राजस्थान की प्रागैतिहासिक संस्कृतियाँ स्थानीय संसाधनों और बाहरी संपर्कों के मेल से विकसित हुईं।आदर्श उत्तर का ढाँचाप्रश्न: राजस्थान की ताम्रपाषाण संस्कृतियों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।उत्तर-बिंदु:ताम्रपाषाण काल में पत्थर के साथ ताँबे का उपयोग हुआ।दक्षिण राजस्थान में आहड़-बनास संस्कृति का विकास हुआ।आहड़, गिलूंड और बालाथल इसके प्रमुख स्थल हैं।काले-लाल मृद्भांड और सफेद चित्रांकन इसकी प्रमुख पहचान हैं।उत्तर-पूर्वी राजस्थान में गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति विकसित हुई।गणेश्वर से ताँबे के औजारों की प्रचुरता मिली।कृषि, पशुपालन, शिल्प और विनिमय अर्थव्यवस्था के आधार थे।हड़प्पा क्षेत्र से संपर्क के संकेत मिलते हैं।निष्कर्षतः, इन संस्कृतियों ने राजस्थान में ग्राम्य जीवन और धातु-कर्म की नींव मजबूत की।12. संभावित वस्तुनिष्ठ प्रश्नप्रश्न 1बागोर किस नदी के किनारे स्थित है?उत्तर: कोठारी नदी।प्रश्न 2तिलवाड़ा किस नदी से संबंधित है?उत्तर: लूनी नदी।प्रश्न 3आहड़ संस्कृति को किस अन्य नाम से जाना जाता है?उत्तर: बनास संस्कृति।प्रश्न 4आहड़ का प्राचीन नाम क्या था?उत्तर: ताम्रवती या ताँबावती।प्रश्न 5धूलकोट किस स्थल से संबंधित है?उत्तर: आहड़।प्रश्न 6गणेश्वर किसके लिए प्रसिद्ध है?उत्तर: ताँबे के औजारों और ताम्रपाषाण संस्कृति के लिए।प्रश्न 7कालीबंगा किस नदी के किनारे स्थित है?उत्तर: घग्घर नदी।प्रश्न 8जुते हुए खेत का प्रमाण राजस्थान के किस स्थल से मिला है?उत्तर: कालीबंगा।प्रश्न 9बागोर का प्रमुख पुरातात्विक महत्त्व क्या है?उत्तर: मध्यपाषाण कालीन जीवन तथा प्रारम्भिक पशुपालन के प्रमाण।प्रश्न 10आहड़ संस्कृति का प्रमुख मृद्भांड कौन-सा है?उत्तर: काले-लाल मृद्भांड, जिन पर सफेद चित्रांकन मिलता है।13. स्रोत-सूचीअध्ययन के लिए निम्न स्रोतों को प्राथमिकता दें:राजस्थान का इतिहास, कला एवं संस्कृति—डॉ. जी. एन. शर्मा।राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति—एल. आर. भल्ला।राजस्थान का इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, परंपरा एवं विरासत—राजस्थान-केंद्रित मानक प्रतियोगी पुस्तकें।Ancient India—R. S. Sharma।The Archaeology of Rajasthan और राजस्थान पुरातत्व विभाग के प्रकाशन।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उत्खनन रिपोर्टें।IGNCA का राजस्थान संबंधी प्रागैतिहासिक सामग्री-पृष्ठ, जिसमें आहड़-बनास क्षेत्र और उत्खनन का विवरण मिलता है। �RPSC/RAS पाठ्यक्रम एवं आधिकारिक प्रश्नपत्र।YouTube पर सहायक पुनरावृत्ति के लिए राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थलों पर उपलब्ध व्याख्यान, जैसे RAS-oriented वीडियो और स्थल-मानचित्र आधारित कक्षाएँ। �YouTube वीडियो को मुख्य प्रमाण न मानें; उसमें दिए गए तथ्यों को मानक पुस्तकों, ASI/राजस्थान पुरातत्व विभाग और विश्वविद्यालयीय सामग्री से मिलाकर पढ़ें। RAS एवं अन्य Group-A परीक्षाओं के लिए सबसे उपयोगी रणनीति है—काल + स्थल + नदी + संस्कृति + विशेषता को एक साथ याद करना।


Comments

Popular posts from this blog

Army GD Model Paper 1 with Solutions by Garhwal Sir

1. पास्कल किसकी इकाई है दाब की  2. चलती हुई बस जब अचानक ब्रेक लgती है तो उसमें बैठे हुए यात्री आगे की दिशा में गिरते हैं किसको किसके द्वारा समझाया जा सकता है  न्यूटन का पहला नियम  3. दूध से क्रीम निकालने में कौन सा बल लगता है  उत्तर अपकेंद्रीय बल  4. ध्वनि की चाल अधिकतम किसमें होती है  उत्तर निर्वात में  5. दाढ़ी बनाने के लिए काम में लेते हैं  अवतल दर्पण  6. इलेक्ट्रॉन की खोज किसने की थी  उत्तर जे जे थॉमसन ने  7.भविष्य का ईंधन किसे कहा जाता है  उत्तर  हाइड्रोजन को  8.धोने का सोडा किस का प्रचलित नाम है  उत्तर सोडियम कार्बोनेट  9.सोडियम बाई कार्बोनेट का सामान्य नाम क्या है  उत्तर beकिंग सोडा  10. पोटेशियम नाइट्रेट का प्रयोग किसके उत्पादन में होता है  उत्तर Uravark के उत्पादन में  11.विश्व पर्यावरण दिवस किस दिन मनाया जाता है  उत्तर है 6 जून को  12. विटामिन ए को किस नाम से जाना जाता है  रेटिनोल  13.yeast ek क्या है  कवक है

Mahavir Chakra and Gallantry Award GD topic

Mahavir Chakra The Mahavir Chakra (MVC) is the  second-highest military decoration  in India and is awarded for acts of conspicuous gallantry in the presence of the enemy, whether on land, at sea or in the air. The Mahavir Chakra was instituted on 26 Jan 1950 to recognise the act of gallantry in the presence of the enemy. The most MVCs awarded in a single conflict were in the Indo-Pakistan War of 1971 when eleven awards are given to the Indian Air Force alone. Till 2017, there are around 218 personnel have been awarded from this medal. Gallantry Awards Gallantry Awards have been instituted by the Government of India to honour the acts of bravery and sacrifice of the officers/personnel of the Armed Forces, other lawfully constituted Forces and civilians. These gallantry awards are  announced twice in a year  – first on the occasion of the Republic Day and then on the occasion of the Independence Day. Types of Gallantry awards Gallantry Awards are classified into two C...

शब्द vichar

शब्द जिस तरह सब्जी पकाने के लिए घी/तेल, नमक, मिर्च, धनिया, हल्दी, टमाटर, पानी व खाद्य (खाने का) पदार्थ जैसे आलू व कोई भी सब्जी की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार विचार-विनिमय के लिए भाषा की आवश्यकता होती है, उस भाषा का निर्माण शब्दों से होता है। यदि शब्द न हो तो भाषा का कोई अस्तित्व नहीं होता है। बोलते समय हमारे मुँह से ध्वनियाँ निकलती है। वह प्रत्येक ध्वनि एक वर्ण को इंगित करती है। इन सब ध्वनियों से मिलकर शब्द बनते हैं और इन्हीं वर्णों का समूह, शब्द कहलाता है। शब्द में प्रत्येक वर्ण का एक निश्चित स्थान होता है यदि निश्चित स्थान पर वर्णों को न रखा जाए तो उन्हें शब्दों का नाम नहीं दिया जा सकता। उसके लिए इसे उचित स्थान पर रखा जाना बहुत आवश्यक है; जैसे -  नवप  शब्द लिखा जाए तो इससे किसी सही शब्द का निर्माण नहीं होगा परन्तु अब इसमें फेरबदल कर दिया जाए तो यह  पवन  शब्द बनाता है। इसी तरह से अन्य सभी शब्दों का निर्माण होता है। इसलिए हम कह सकते हैं एक या अधिक वर्णों से बनी हुई स्वतंत्र सार्थक ध्वनि, शब्द कहलाता है...