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Indian Polity - Historical Background In Hindi Laxmikant Notes

🔴1773 का रेगुलेटिंग एक्ट🔴

अत्यधिक संवैधानिक महत्व , ब्रिटिश सरकार द्वारा  उठाया गया पहला कदम जो कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा में था , पहली बार प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों को मान्यता मिली ,भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी गई !

🌼 अधिनियम की विशेषता 🌼

1. बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल पदनाम दिया ,  गवर्नर जनरल की सहायता के लिए चार सदस्य कार्यकारी परिषद का गठन और पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स थे ।

2. कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने और भारतीयों से उपहार और रिश्वत लेने पर प्रतिबंध किया

3.  सरकार का कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ( कंपनी की गवर्निंग बॉडी )  का कंपनी पर नियंत्रण सशक्त,  भारत में राजस्व नागरिक और सैन्य मामलों की जानकारी ब्रिटिश सरकार को देना आवश्यक किया ‌।

🔴1784 का पिट्स इंडिया एक्ट🔴

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 की कमियों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा एक संशोधित अधिनियम 1781 में पारित किया ( एक्ट ऑफ सेटलमेंट )  इसके बाद एक अन्य महत्वपूर्ण अधिनियम पिट्स इंडिया एक्ट 1784 में अस्तित्व में आया ।

🌼 अधिनियम की विशेषताएं 🌼

1. कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्य कार्य पृथक किए

2.  निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों के अधीक्षण की अनुमति दे दी लेकिन राजनीतिक मामलों के प्रबंध के लिए नियंत्रण बोर्ड ( बोर्ड ऑफ कंट्रोल )  नाम से एक नए निकाय का गठन कर दिया

3. द्वैध शासन व्यवस्था का शुभारंभ

4. नियंत्रण बोर्ड को शक्ति थी वह ब्रिटिश नियंत्रित भारत में सभी नागरिक सैन्य सरकार व राजस्व गतिविधियों का अधीक्षण व नियंत्रण करें।

यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण

1. भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्र को  पहली बार ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र कहा गया

2. ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यो और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया।

🔴1833 का चार्टर अधिनियम🔴

ब्रिटिश भारत के केंद्रीय करण की दिशा में यह अधिनियम निर्णायक कदम था

🌼 अधिनियम की विशेषताएं 🌼

1. बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया जिसमें सभी नागरिक और सैन्य शक्तियां निहित

2.  अधिनियम ने पहली बार एक ऐसी सरकार का निर्माण किया जिसका ब्रिटिश कब्जे वाले संपूर्ण भारतीय क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण था लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे।

3. मद्रास और मुंबई के गवर्नरों को विधायिका  संबंधी शक्ति से वंचित कर दिया , भारत के गवर्नर जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान कर दिए,
पहले बनाए गए कानूनों को नियम और कानून कहा गया , नए कानून के तहत बने कानूनों को एक्ट या अधिनियम कहा गया

4. ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक निकाय के रूप में की जाने वाली गतिविधियों को समाप्त कर दिया यह विशुद्ध रूप से प्रशासनिक निकाय बन गया कंपनी के अधिकार वाले क्षेत्र ब्रिटिश राजशाही और उसके उत्तर अधिकारियों के विश्वास के तहत ही कब्जे में रह गये

4.चार्टर एक्ट 1833 सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का आयोजन शुरू करने का प्रयास किया कहा गया कि कंपनी में भारतीयों को किसी पद , कार्यकाल और रोजगार को हासिल करने से वंचित नहीं किया जाएगा । कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध के कारण इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया।

🔴 1853 का चार्टर अधिनियम 🔴

1793 से 1853  के दौरान ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किए गए चार्टर अधिनियमो की श्रृंखला में अन्तिम अधिनियम , संवैधानिक विकास की दृष्टि से यह अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम

🌼अधिनियम की विशेषताएं 🌼

1. पहली बार गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी एवं प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया, परिषद में छह नए पार्षद और जोड़े गये इन्हें विधान पार्षद कहा गया गवर्नर जनरल के लिए नई विधान परिषद का गठन किया जिसे भारतीय ( केंद्रीय ) विधान परिषद कहा गया इस शाखा ने छोटी संसद की तरह कार्य किया इसमें वही प्रक्रिया अपनाई जो ब्रिटिश संसद में अपनाई जाती थी विधायिका को पहली बार भारत के विशेष कार्य के रूप में जाना गया इसके लिए विशेष मशीनरी और प्रक्रिया की जरूरत थी।

2.  सिविल सेवकों की भर्ती एंव चयन हेतु खुली प्रतियोगिता व्यवस्था का शुभारंभ किया, विशिष्ट सिविल सेवा भारतीय नागरिकों के लिए भी खोल दी गई और 1854  में  (भारतीय सिविल सेवा के संबंध में)  मैकाले समिति की नियुक्ति की गई।

3.  कंपनी के शासन को विस्तारित कर दिया, भारतीय क्षेत्र को इंग्लैंड राजशाही के विश्वास के तहत कब्जे में रखने का अधिकार दिया लेकिन पूर्व अधिनियमों के विपरीत इसमें किसी निश्चित समय का निर्धारण नहीं
स्पष्ट था कि संसद द्वारा कंपनी का शासन किसी भी समय समाप्त किया जा सकता था।

4.  प्रथम बार भारतीय केंद्रीय विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रारंभ किया।  गवर्नर जनरल की परिषद में छह नए सदस्यों में से , चार का चुनाव बंगाल , मद्रास, बंबई और आगरा की स्थानीय प्रांतीय सरकारों द्वारा किया जाना था

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